Tuesday, May 10, 2011

ज़िन्दगी- बस ऐसे जीना.....





उजालो से जब वास्ता रखना,
अंधेरो को अपना निगहबान रखना!

हवा.. जब तेज़.. बहुत तेज़ .. आँचल उड़ाने लगे,
पकडे तुम तमन्नाओं का .. हर दम .. दामन रखना!

पूरी हो हर ख्वाहिश .. जब कभी भी तेरी,
गज भर ज़मीन.. आखिरी सफ़र की.. तब भी तैयार रखना!

बुरा क्या, भला क्या... वक़्त की पहचान क्या है?
क्या होगा.. ये ना सोच.. बस अपना खुदा याद रखना!

गर्मी पड़े.. या.. सर्दी.... या हो चाहे फुहार,
तुम बस अपने तजुर्बे को याद रखना!

किसी कूचे से अगर .. दे सुनाई .. किसी की आवाज़,
हर दहकती आग के लिए चशम-ए-रहम साथ रखना!

तेरे साथ हुआ क्या-क्या बुरा.... उनको तू भूल ही जा,
क़यामत में पूछेगा "वो" ... अपनी नेकिया तू याद रखना!

Saturday, May 7, 2011

दोस्त...हमसे रूठ के कैसे रह पाओगे!!




जो इस तरह तुम हमसे रूठ जाओगे,
मेरी छोड़ो, तुम खुद कैसे तनहा रह पाओगे!

मानता हूँ कभी किसी समय, हम अजनबी थे,
क्या गुजरा वक़्त इतनी आसानी से भुला पाओगे!

हमारी दोस्ती का उसूल हैं.."हर हालात, हर पल का साथ"
तुम सिक्के के चित को पट से कैसे जुदा कर पाओगे!

सवाल हैं दुनिया के, कब तक अकेले जूझोगे इनसे,
बिन आजमाए मेरे दोस्त, मेरी दोस्ती पे इलज़ाम कैसे लगा पाओगे!

रहोगे अलग...तो खुद को खुद से कैसे बचाओगे,
कांटे हटाकर फूल को महफूज़ कैसे रख पाओगे!

ममता नहीं, वफ़ा नहीं, ये दोस्ती का दामन है दोस्त,
इसे भी छुडा लिया, तो दुनिया से कैसे लड़ पाओगे!

Sunday, April 17, 2011

बस एक ... तू!




इश्क के नाम से डर लगता था,
अब तो बिन इसके .... जीना ही एक बिमारी हैं!

पल पल का साथ कर अता ए मौला,
मेरे लिए तो ..यही .. दुनिया सारी हैं!

देख के उनको जो मिलता है सुकून,
एक इसी के लिए तो ....ये दुनिया मारी हैं!

कहीं रुका.. तो लगा ये ख्याल था वाजिब,
तुझी पे तो उसने ये दुनिया वारी हैं!

चिरागों से अब मुझे क्या लेना..
तेरा संग ही... अब रौशनी हमारी हैं!

नाम तेरा ले के जो मुझ पे हंसते हैं,
वो नहीं.. उनकी जुबान हमे प्यारी हैं!

तुझे बनाया उसने.. इसीलिए हम सजदा करते हैं,
वरना अपनी नहीं "उस" से कोई यारी हैं!

Saturday, April 9, 2011

उम्मीद और इंक़लाब



ना कहीं धुँआ हैं, ना राख उड़ रही हैं,
फिर भी ना जाने क्यों, लगता है...कही.. कोई चिंगारी जल रही हैं!

हर तरफ आवाम है ..... एक नया आयाम हैं,
फिर भी एक अजीब सी .... खामोशी दिख रही हैं!

आना अकेले .. जाना अकेले .... गुमान ये सबको ही हैं..
फिर भी बुत-परस्तिश की ... इंतिहा हो रही हैं!

किसी उधडे कपडे की तरह, मेरा कुछ अंश छूटता जा रहा हैं,
फिर भी दिल में, वापसी की ... उम्मीद .. जी रही हैं!

सुकून मिलता है .. शोर-ओ-गुल के बने रहने से...
बताओ आज कहाँ .. इंक़लाब की आवाज़ उठ रही हैं!

चिताए ही चिताए है नज़र मे ...... इस कोने से उस कोने तक,
एक मसीहा की उम्मीद में.... अब ये नज़र ... आग ढूँढ रही है!

Saturday, April 2, 2011

तेरी गलियों ... के सवाल





कौन है मेरा कातिल, उसे ढूँढ रहा हूँ मैं...
ले के कुछ सवाल, तेरी गलियों से आज बिछड़ रहा हूँ मैं!

माझी ये मेरा... मुझे और क्या देगा..
निशानी-ए-मोहसिन... दिल-ए-बेजान में लिए जा रहा हूँ मैं!

अलफ़ाज़ भी हैं,... और अरमान भी इस दिल में,
दबा के सीने में उनको, मुस्कुराए जा रहा हूँ मैं!

खैर-गाह हो तेरा अल्लाह, रहे सलामत हर पल तू,
नेकियाँ मेरी तेरे नाम हो, ये कलमा पडे जा रहा हूँ मैं!

कभी तू मुझे रूह सी, कभी साए सी लगती हैं,
इसीलिए छोड़ के सब अंधेरे, उजालो से दोस्ती निभा रहा हूँ मैं!

कहना तो मुझे भी होगा, अलविदा एक मुकाम पर,
बस उस-से पहले..खुद को, तुझ सा बनाए जा रहा हूँ मैं!

इश्क हैं मेरा कातिल, तुझे तो खबर भी नहीं,
तेरी ख़ुशी के लिए, हंसता हुआ रुखसत लिए जा रहा हूँ मैं!