Saturday, November 20, 2010

?? क्या गलत .... क्या सही ??





खुमार-ए-गम का गज़ब आलम देखो,
मुझे मेरे ही अक्स से जुदा देखो!

बहती हवा कानो में एक लम्हा कह रही हैं,
लम्हे में कैद, एक पुरानी कहानी देखो!



लबो से बरसती शफा का असर, मैं कैसे देखू,
ए मसीहा कभी अपने होठो पे, मेरा नाम भी तो देखो!

ख्वाबो में शामिल, हर एक आरज़ू मचल रही हैं,
मचलती आरजूओ में लिपटी रवानियो को देखो!



ये शामें, ये राहें.. मुझे कुछ सुना रहे हैं,
सीने में कैद, इनके अच्छे-बुरे साजो को देखो!

ये समा, ये क़ज़ा.. आँखों में बंद सवालों जैसे,
इन उलझे सवालों के जवाबो को तो देखो!



एक नायाब अंदाज़, हर मोड़ पे दिखाती ज़िन्दगी,
हर एक की मुन्तजिर-ए-मौत.. जिंदगानी देखो!

मौत की तरफ चलती हर दम ... जिंदगानी को क्या देखू,
रास्ते में जलते, चिरागों की गिनती देखो!

2 comments:

  1. बहती हवा कानो में एक लम्हा कह रही हैं,
    लम्हे में कैद, एक पुरानी कहानी देखो!
    खुबसूरत शेर बहुत बहुत बधाई

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