जो देखा, वो लिखा...... यूँ ही अपना सफ़र चलता रहा!
सीखा जो सिखाया... मैं यूँ ही बस चलता रहा!
करने को तो, मैं भी रहगुज़र कर सकता था किसी एक कोने में,
पर मेरा सफ़र........
हर मोड़ पर, मुझे हर बार एक नया एहसास सिखाता रहा!
Sunday, August 5, 2012
तसव्वुर-ए-सनम
कुछ भी कर लूँ, तुझे भुला नहीं पाता,
यूँ भी मैं अपनी ही लकीरों से , जीत नहीं पाता !
हर एक शब् , तेरे ही तसव्वुर में जिया करता हूँ ,
मैं चाह कर भी , तेरी चाहत को रोक नहीं पाता !
दर्द उठता हैं , टीस भी हरदम रहती हैं ,
मैं इस दर्द के सिवा .. कुछ पास रख नहीं पाता !
डर लगता हैं कहीं राह में हम टकरा ना जाए ,
मैं इस दिल पे यूँ भी एहतियात नहीं रख पाता !
सलाह मशविरा तो हर ख़ास -ओ -आम ने दे डाला ,
तेरे तसव्वुर में फिर , मैं कुछ और सोच ही नहीं पाता !
दुआओ में हसरत खुद के वजूद की नहीं ... तेरी सलामती की हैं ,
अपने लिए तो मैं आज भी हाथ उठा नहीं पाता !
Wednesday, July 18, 2012
आज भी......हम!!
आज उनके देखे से एक गुमान हो गया ,
शायद ये दिल किसी और की अमानत में हैं !
कहने को आज भी हम किस्सों कहानियों में होते है ,
लेकिन दिल से हम आज भी आप ही के ख्यालों में हैं!
देखा है गुल को , हवा को ... मदहोश करते हुए,
इल्म है हमें ..... ये खुदाई भी, आप ही के एहसान से ही हैं!
मोड़ कई गुज़रे , पर इस मोड़ से हम कैसे गुज़रे ?
डर उनकी ना से ज्यादा ..... उनके हाँ कह देने से हैं!
कैसे कहे हम जो कहना चाहते है आपसे,
हर लफ्ज़ की कश-म-कश का अंत , तेरे इकरार से ही हैं!
Friday, July 6, 2012
तलाश-ए-हमसफ़र
अभी सर्दी की धूप सी, कुछ हलकी सी... बन रही हैं,
होगी तू जब सामने... मेरी तकदीर बन जायेगी!
ख्वाबो में कभी-कभी.. तेरा अक्स बनाने की कोशिश की हैं,
जाने कब तलक, वो तस्वीर पूरी हो पाएगी!
सूरत ले के निगाहों में, चल पड़ा हूँ मैं राहो पे,
लगता हैं ये राहे ही .. अब मेरी मंजिल बन जायेंगी!
आती-जाती राहो पे, मैं तेरे निशाँ ढूंढता हूँ,
सफ़र से हमसफ़र.. जाने कब ये हो पाएगी!
हसरतो की गुलशन में, इमारते तो बहुत बन रही हैं,
होगी तू साथ तो, इन इमारतों में छते भी बन जायेगी!
Friday, June 29, 2012
कभी आप भी मुझे ऐसे मिलें!
एक इल्तजा थी कि ए खुदा मुझे सुकून मिले,
उस ख्वाहिश के बदले ही मुझे आपके पहले दीदार मिले!
उम्मीद का दामन थामे.. मेरी तरसती उम्मीदें,
रब्बा .. शायद अगले मोड़ पर मुझे नया मेरा रब मिले!
काश ऐसा हो कि हर रोज़ जब मेरी आँख खुले,
मेरा साया.. मेरा हमदम ... मुझे मेरे पास मिले!
चिराग में बंद किसी जिन्नाद सी मेरी खुशियाँ,
दुआ है खुदा से .. बस तेरी मोहब्बत की मुझे तपिश मिले!
मकतब-ए-दुनिया में वैसे तो मैने कुछ नहीं जाना,
मुझे तो सभी रोशन रंग.. बस तेरी उस एक झलक में मिले!
तेरे नखरे, तेरी सादगी... कही ले ले ना जान मेरी,
खुदा-या अगर मिले .. तो मुझे मौत भी उसी की पनाहों में मिले!
Saturday, June 23, 2012
कशमकश-ए-ज़िन्दगी .... तेरा मैं क्या करूँ?
कशमकश-ए-ज़िन्दगी भरपूर हैं, नामंजूर हैं...
ना प्यास-ए-ज़िन्दगी सही जाती हैं,
ना कासाह-ए-आब-ए-मौत गले उतरता हैं!
बिछड़ते यार ने मुख्तलिफ जज़्बात बना दिए...
ना उसकी उम्मीद-ए-ज़िन्दगी रोके बनती हैं,
ना खुद का जुदाई-ए-गम सहा जाता हैं!
मकतब-ए-दुनिया में जाने हमने क्या क्या सीखा...
ना वो बचपन की चादर छूटते बनती हैं,
ना ये सयानापन हमे ढ़ाक पाता हैं!
इन शाम की तन्हाईयों को किन रंगों से भरूँ...
ना दिन की चमक, इन्हें उजला बना पाती हैं,
ना रात का सन्नाटा इन्हें कोई आवाज़ दे पाता हैं!
शमा-ए-महफ़िल बना के, खुदा ने सितम कर डाला...
खुद की जलन तो सीने में दबी रहती हैं,
परवाने की मौत का इलज़ाम भी सहना पड़ता हैं!
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