Friday, August 6, 2010

हौसला बुलंद




मिलता अगर ये जहान मुकम्मल, तो इबादत कोई क्यूँ करता
मिलती अगर हर शह अपनी मुट्ठी में, तो कोई मेहनत ही क्यों करता,
चाहने वालो की चाहत हमेशा उनके दिलो में रहती है...
जो ना होती दिल में ही अगर ये चाहत, तो कुछ कर गुजरने की हसरत कोई क्यों करता

तोडे कई पहाड कईयो ने, तो मोडे कई दरिया किसी ने,
थी आरजू उनके दिल में, तो किये ऐसे हजार काम उन्होंने,
था दिल में बस एक ही जजबा ..कि पाना है अपनी हसरतो को,
उसके लिए खुदा तक को भी , मजबूर कर दिया उन्होंने!!

हो पक्का इरादा और दिल में एक भूख जीतने की,
तो छीन लेते है वो रौशनी भी आग की,
नज़र नज़र का फर्क होता है दोस्तों ऐसे लोगो में,
दिखती है जहां खाई किसी को, आशियाने बसा लेती है वहा भी जिंदगी...

Thursday, July 8, 2010

बद-गुमाँ


सोचता था कि ये एक गुमाँ होगा,
उसके चेहरे में कोई आइना होगा!

उसकी बातें तो हमेशा मुझे खीचती थी,
बातो में ही, उसकी कोई नशा होगा!

तन्हाई में भी वो साथ मेरे रहती थी,
पिछले जनम का, ये हमारा रिश्ता होगा!

यादों में आज भी उनकी खुशबु हैं शामिल,
ये तब की होगी, जब मैने उन्हे छुआ होगा!

वो थी जब हंसती मेरी बातों पर,
लगता.. उसके दिल में भी मेरी मुकाम होगा!

आज नहीं हैं वो साथ मेरे...
पर मेरी धड़कन से, उसका भी दिल चलता होगा!

Sunday, July 4, 2010

तेरा इश्क ही मेरी पहचान है...मैं इसे छुपाऊ कैसे???


तेरी खुश्बू को अपनी साँसों से मिटाऊ कैसे,
यादो के साहिल से तेरी तस्वीर की रेत हटाऊ कैसे?

वैसे तो दोस्त अब भी हाल-ए-दिल पूछते है,
उनको मैं अपना दर्द-ए-दिल, ये दिखाऊ कैसे?

कहते है मय भुला देती है, सारे ही गम..
मैं पैमानों में नाचती, तेरी मुस्कान को भुलाऊ कैसे?

लोग कहते है इश्क देता है सिर्फ़ गम, ना कि खुशी किसी को,
मैं इन नादानों को, अपनी अन्दर की कश-म-कश दिखाऊ कैसे?

तेरी आवाज़ को मैं अब भी, अपनी तन्हाई में संग पाता हूँ,
अपनी इस खामोश मुफलिसी को, खुद ही से छुपाऊ कैसे?

Monday, June 28, 2010

बदलाव और चाहत

बदलाव .... जो आप लाये
मुझे आज एक मुकम्मल शाम मिल गयी,
मेरी मसरूफ ज़िन्दगी में कुछ हसीं पल भर गयी,
थी शायद आज ये ज़िन्दगी भी मुझ पे कुछ मेहरबान....
मेरी तन्हाई में ये तेरी मुस्कराहट भर गयी!!



चाहत .... जो आप लाये
जानने में तुझे ये ज़िन्दगी बिताना चाहता हूँ,
बस एक बार, मैं खुद को आजमाना चाहता हूँ,
मुझे नहीं पता, हैं ये तेरी कशिश या दीवानगी मेरी,
मैं बस अपनी पहचान, तेरे नाम से बनाना चाहता हूँ!

Saturday, June 19, 2010

मेरी नादान कोशिश ...!!



हमने सुबकती आँखों को इस कागज़ पर,
उकेरने की नाकाम कोशिश की हैं.
हमने कांपते होठो की मद्धम आवाज़ को,
यहाँ एक गूँज बनाने की कोशिश की हैं....

बिन पीये हमे दीवानगी दिखी..
और हम थोड़ा सा बहक गए,
हमने उस खुमारी को ..बिन घुंघुरू के,
इस चक्कते पे नचाने की कोशिश की हैं!

मुश्ताक-ऐ-दीद थे उन दिनों हम,
नतीजा-ऐ-इश्क से अनजान थे,
हमने उन बेताब पलो की चोटो को
नासूर बनाने की पुरजोर कोशिश की हैं

निजात पा सके इस दौर से,
कभी ऐसा तसव्वुर ना रखा हमने,
हमने हर आते-जाते झोंके में,
उनकी छुअन महसूस करने की,ता-उम्र, कोशिश की हैं!

दिल में छुपे इस इश्क का,
हम कोई परचम नहीं चाहते..
आप चाहे जहां रहे..बस खुश रहे..
हर अता में.. हमने यही गुजारिश की हैं!